- ब्रज वंदना (चारकुला नृत्य)
- श्री राधिका जन्मोत्सव लीला
- श्री कृष्ण अवतार लीला
- नन्द महोत्सव गोकुल लीला
- श्री कृष्ण बाल लीला
- माखन चोरी लीला
- गौचरण लीला
- चीर हरण लीला
- राधा कृष्ण प्रेमलीला
- पनघट लीला
- गोवर्धन लीला
- मयूर नृत्य लीला
- मान लीला
- डांडिया रास लीला
- कृष्ण विवाह मनुहार लीला
- श्री राधिका मंगलम लीला
- लठमार होली
- फूलों की होली
- श्री जमुना चुनरी महोत्सव
- झूलन उत्सव
- जेहर नृत्य
- माता कात्यायनी लीला
- गोपी गीत लीला
- महारास लीला
- द्वारका लीला
- रूक्मणी मंगलाम लीला
- नरसी चरित्र
- मीरा चरित्र
- सीता स्वंयवर
- शिव लीला
गौचरण लीला
गौचरन लीला
गोपाष्टमी को ब्रज संस्कृति का एक प्रमुख उत्सव माना जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गौ चारण लीला शुरू की थी। गोपाष्टमी ब्रज में संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। गायों की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम ‘गोविन्द’ पड़ा। कार्तिक, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। 8वें दिन इन्द्र अहंकार रहित होकर भगवान की शरण में आये। कामधेनु ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उसी दिन से इनका नाम गोविन्द पड़ा। इसी समय से अष्टमी को गोपोष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा, जो कि अब तक चला आ रहा है।
इस दिन बछडे़ सहित गाय की पूजा करने का विधान है। इस दिन प्रातः काल में उठकर नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान आदि करते हैं। प्रातः काल में ही गायों को भी स्नान आदि कराकर गौ माता के अंग में मेहंदी, हल्दी, रंग के छापे आदि लगाकर सजाया जाता है, तथा गंध-धूप-पुष्प आदि से पूजा करें और अनेक प्रकार के वस्त्रालंकारों से अलंकृत करके गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है। इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं।
गायों को गो-ग्रास देकर उनकी प्रदक्षिणा करें और थोड़ी दूर तक उनके साथ में जाएँ तो सभी प्रकार की अभीष्ट सिद्धि होती हैं। गोपाष्टमी को सांयकाल गायें चरकर जब वापस आयें तो उस समय भी उनका अभिवादन और पंचोपचार पूजन करके कुछ भोजन कराएँ और उनकी चरण रज को माथे पर धारण करें। उससे सौभाग्य की वृद्धि होती है। भारतवर्ष के प्राय: सभी भागों में गोपाष्टमी का उत्सव बड़े ही उल्लास से मनाया जाता है। विशेषकर गोशालाओं तथा पिंजरा पोलो के लिए यह बड़े ही महत्त्व का उत्सव है। इस दिन गोशालाओं की संस्था को कुछ दान देना चाहिए।
इस प्रकार से सारा दिन गो-चर्चा में ही लगना चाहिए। ऐसा करने से ही गो वंश की सच्ची उन्नति हो सकेगी, जिस पर हमारी उन्नति सोलह आने निर्भर है। गाय की रक्षा को हमारी रक्षा समझना चाहिए। इस दिन गायों को नहलाकर नाना प्रकार से सजाया जाता है और मेंहदी के थापे तथा हल्दी रोली से पूजन कर उन्हें विभिन्न भोजन कराये जाते हैं।
गाय को गोमाता भी कहा जाता है। गोपाष्टमी यह सन्देश देती है की ब्रह्माण्ड के सब काम चिन्मय भगवत सत्ता से ही हो रहे हैं परन्तु मनुष्य अहंकारवश यह सोचता है कि हमारे बल से ही यह चलता है- वह चलता है। इस भ्रम को दूर करने के लिये ही भगवान दुख और परेशानी भेजते हैं ताकि मनुष्य सावधान होकर इस अहंकार से छूट जाए । जब वह अपने अहंकार को छोड़ परमात्मा की शरण जाता है तो सारी मुसीबतें दूर होकर उसे परमानंद कि प्राप्तिसहज में हो जाती है । वर्ष में जिस दिन गायों की पूजा अर्चना की जाती है वह दिन भारत में गोपाष्टमी के नाम से मनाया जाता है । जहाँ गाय पाली-पौंसी जाती हैं , उस स्थान को गोवर्धन कहा जाता है ।
गोपाष्टमी का इतिहास
गोपाष्टमी महोत्सव गोवर्धन पर्वत से जुडा उत्सव है । गोवर्धन पर्वत को द्वापर युग में भगवान् श्री कृष्ण ने कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक गाय व् सभी गोप-गोपियों की रक्षा के लिए अपनी एक उंगली पर धारण किया था । गोवर्धन पर्वत को धारण करते समय गोप-गोपिकाओं ने अपनी- अपनी लाठियों का भी टेका दे रखा था। जिसका उन्हें अहंकार हो गया की हम लोग ही गोवर्धन को धारण किये हुए हैं । उनके अहम् को दूर करने के लिए भगवान् ने अपनी ऊँगली थोड़ी तिरछी की तो पर्वत नीचे आने लगा । तब सभीने एक साथ शरणागति की पुकार लगाई और भगवान् ने पर्वत को फिर से थाम लिया ।